यह अभी से अनुमान लगया जा सकता है अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट प्रत्याशी जो बाइडन की जीत की दशा में अमरीका में समीकरण, काफी हद तक बदल जाएगें। डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन, ईरान, सीरिया, युरोप और फिलिस्तीन के सिलिसले में अमरीका की विदेश नीतियों में काफी बदलाव किये हैं। इसके अलावा भी उनकी नीतियों ने विश्व व्यापार, जलवायु और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालें हैं। इस लिए अगर बाइडन जीतते हैं तो निश्चित रूप से अमरीका की विदेश नीतियों में बुनियादी बदलाव होंगे।
अमरीका , बाइडन को चुन कर यह साबित करेगा कि अमरीकी जनता, नये युद्ध में फंसने की विरोधी है और उसकी वजह भी यह है कि इस प्रकार के अमरीकी सरकार के हस्तक्षेप से अमरीका की सुरक्षा व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है। इसी लिए अमरीका में एक डेमोक्रेट के सत्ता में आने से ईरान और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देशों के लिए स्थिति अपेक्षाकृत शांत होगी।
सऊदी अरब और यूएई के लिए अमरीका में सरकार में बदलाव का मतलब, ट्रम्प के राष्ट्रपति काल से पहले की परिस्थितियों की वापसी है। इसके साथ ही अगर अमरीका में डेमोक्रेट विजयी हुए तो अरब देशों में मानवाधिकारों के हनन के विषय में चर्चा होगी और अमरीकी कांग्रेस में भी यह मद्दा उठेगा।
अगले चरण में अमरीका की यह समझ में आ जाएगा कि वह अकेले ही दुनिया का नेतृत्व नहीं कर सकता, उसे पता चल जाएगा कि अमरीका की मनमानी का समय बीत चुका है और अब वह अन्य सरकारों को अपने इशारों पर नहीं नचा सकता बल्कि अब वह भी अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दूसरों के साथ सहयोग पर मजबूर है। इस के बाद से अमरीका की नयी विदेश नीतियों में प्राथमिकताएं, कोरोना के आर्थिक प्रभावों से बचाव और आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने पर आधारित होंगी।
अगले चरण में युरोप में चीन पर आर्थिक विश्वास बढ़ेगा और चीन युरोप का आर्थिक व रणनीतिक घटक बन जाएगा। चुनाव के बाद विश्व स्तर पर अमरीका की भूमिका धीरे धीरे कम होती जाएगी लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि विश्व स्तर पर अमरीका की भूमिका पूरी तरह से खत्म हो जाएगी बल्कि इसका अर्थ यह है कि अमरीका भी नये सहयोग और नये गठबंधनों की शरण में जाएगा। युरोप में अमरीका के एसे राष्ट्रपति का स्वागत किया जाएगा जिसके साथ सहयोग संभव होगा। विशेषकर इस लिए भी कि ईरान और युरोप की सुरक्षा के बारे में अमरीका व युरोप में सहयोग की कमी की वजह से युरोप नये क़दम और नये संतुलन के बारे में सोचने पर मजबूर हो गया है।
अगर ईरान के मुद्दे पर ध्यान दें तो हमें यह नज़र आएगा कि ट्रम्प ने परमाणु समझौते से निकल कर इस्राईल के साथ सहयोग बढ़ा दिया लेकिन ईरान के साथ अपनी समस्या का समाधान खोजने में सफल नहीं रहे जैसा कि वह इलाक़े की अन्य समस्याओं के निदान में भी विफल रहे, मिसाल के तौर पर फिलिस्तीन का मुद्दा उसी तरह से बना हुआ है जैसा कि यमन और लीबिया में भी युद्ध की परिस्थितियां पहले जैसी बनी हुई हैं।
इस लिए यह आशा की जा सकती है कि अमरीका के नये राष्ट्रपति, पहले ही चरण मे ईरान के प्रति अमरीका के रवैये में बदलाव लाएंगे जिसके लिए यह ज़रूरी है कि ईरान अपनी स्थिति पर डटा रहे, उसके बाद अमरीका को ईरान के साथ संबंध में एक प्रकार से शांति की ज़रूरत है जिसके लिए उसे ईरान के खिलाफ प्रतिबंध और उस पर दबाव में कमी करना होगा ताकि इस तरह तरह से ईरान को वार्ता पर तैयार किया जा सके जिसके बाद ही परिस्थितियों को शांत करना संभव है।
ईरान और अमरीका के मध्य विवाद का एक बड़ा भाग, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और ईरान की क्षेत्रीय भूमिका है लेकिन अमरीका के नये राष्ट्रपति के सत्ताकाल में, ईरान की क्षेत्रीय भूमिका से अमरीका को कोई विशेष समस्या नहीं होगी बल्कि अमरीका ईरान के साथ समझौते का मार्ग तलाश करने के प्रयास में होगा। यह भी हो सकता है कि एसे गठबंधन भी बन जाएं जिनका मक़सद सीधे टकराव के बिना ही युद्ध विराम और ईरान के व्यवहार में बदलाव हो, यह संभावना, ट्रम्प सरकार की नीतियों के बिल्कुल उलट है।